आरक्षण- वर्तमान में आरक्षण को लेकर काफी जन आक्रोश देखने के मिल रहा है, हर वर्ग आरक्षण को लेकर अपनी बात मनवाने में तुला हुआ है एवं सभी राजनितिक पार्टियाँ इस मुद्दे को भुनाने में लगी हुई हैं | यह लेख इसी पर आधारित है एक समीक्षा मात्र है |
डिस्क्लेमर :- “इस लेख का किसी भी पार्टी राजनितिक दल, जाति वर्ग सम्प्रदाय से कोई ताल्लुक नहीं |यह आरक्षण पर विभिन्न तथ्यों पर समीक्षा मात्र है |”
सुप्रीम कोर्ट के आदेश एवं संविधान के हिसाब से वर्तमान में एससी एसटी, माइनॉरिटी एवं ओ बी सी वर्ग को 49.5 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था है , एवं अन्य सभी वर्ग के लिए 51.5 प्रतिशत ओपन कोटा दिया गया है | 51.5 प्रतिशत में सामान्य वर्ग एवं अन्य आते हैं | इसे समझने के लिए लेख की गंभीरता से पूरा पढ़ें |
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वर्तमान में सभी जातियों के लिए आरक्षण की व्यवस्था कुछ इस प्रकार है :-
22.5 % = अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (7.5% STs, 15% SCs)
27 % = पिछड़ा वर्ग एवं माइनॉरिटी को मिलाकर
51.5 = सामान्य वर्ग एवं अन्य (सभी जातियाँ मिलाकर जो ओपन कोटा से हो)
इसके अलावा अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति एवं पिछड़ा वर्ग को मिलने लाभ कुछ इस प्रकार हैं की कोई भी सरकारी नौकरी में अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति को 5 वर्ष की छूट उम्र में एवं पिछड़ा वर्ग को 3 वर्ष की छूट दी जाति है | इसके अतिरिक्त भी अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति की ज़्यादातर परीक्षा फीस में या तो शुन्य फीस होती है या फिर सामान्य एवं पिछड़ा वर्ग के मुकाबले एक चौथाई फीस ही लगती है | यह तो रही फीस एवं उम्र में छूट के लाभ की बात इसके अलावा भी नौकरी में प्रोमोशन, यात्रा भत्ता एवं अन्य कई तरह के प्रत्यक्ष एवं परोक्ष लाभ इन जातियों को प्राप्त है |
अब इस जाति में आरक्षण का फायदा या नुक्सान किसे मिल रहा है यह सोचने वाली बात है वर्तमान में भारत में जनसँख्या प्रतिशत कुछ इस प्रकार है :
| Category | % population |
|---|---|
| SC अनुसूचित जाति | 19.7% |
| ST अनुसूचित जनजाति | 8.5% |
| OBC पिछड़ा वर्ग | 41.1% |
| Forward Castes/Others सामान्य | 30.8% |
अगर इस चार्ट को देखें तो 28 प्रतिशत एवं अनुसूचित जाति एवं जनजाति को 22.5 प्रतिशत आरक्षण प्राप्त है, 41 प्रतिशत पिछड़ा वर्ग को मात्र 27 प्रतिशत एवं 30 प्रतिशत सामान्य वर्ग को 51.5 प्रतिशत अलिखित आरक्षण प्राप्त है | अगर जातिगत समीक्षा की जाय तो यहाँ सर्वाधिक नुकसान पिछड़ा वर्ग को हो रहा है | अब अगर सामान्य वर्ग के नुक्सान की बात की जाय तो सामान्य वर्ग को किस प्रकार से नुक्सान है??? 51.5 प्रतिशत अलिखित आरक्षण में जो की यह कहा जाय की सामान्य वर्ग के लिए है लेकिन जब किसी सरकारी नौकरी की बात होती है सीटो की व्यवस्था देखते हुए पिछड़ा वर्ग एवं अनुसूचित जाति एवं जनजाति के उम्मीदवार इन सीटो से भी आवेदन कर देते हैं , यानि की पिछड़ा वर्ग एवं अनुसूचित जाति एवं जनजाति के पास एक सुविधा यह है की वे अपनी केटेगरी के अलावा सामान्य कोटे से भी अपनी उम्मीदवारी पेश कर सकते हैं, हालाँकि सामान्य वर्ग से उम्मीदवारी पेश करने पर पिछड़ा वर्ग एवं अनुसूचित जाति एवं जनजाति के उम्मीदवारों को आरक्षण का कोई लाभ नहीं प्राप्त नहीं होता है , लेकिन सामान्य वर्ग के के पास ऐसी कोई सुविधा उपलब्ध नहीं है , और इसी का विरोध सामान्य वर्ग कर रहा है | तो अगर सभी तरह से देखा जाय तो सामान्य वर्ग को प्रत्यक्ष रूप से नुक्सान हो रहा है एवं पिछड़ा वर्ग को आरक्षण के नाम पे एक झुन्जुना पकड़ा दिया गया है |
इसके अलावा भी विभिन्न संस्थानों में एडमिशन एवं सरकारी नौकरी में विभिन्न पदों के सभी वर्गों के लिए सीटे आरक्षित होती है ,एवं उन्हें प्राप्त करने के लिए होने वाले इंट्रेंस एग्जाम या सरकारी नौकरी के लिए परीक्षा में मिलने वाले प्राप्तांको के अनुसार बनने वाली मेरिट में सबसे ज्यादा नुकसान सामान्य एवं पिछड़ा वर्ग को उठाना पड़ता है , जैसे की वर्ष 2015 में जे ई ई की परीक्षा की कट ऑफ देखी जाय तो सामान्य वर्ग की कट ऑफ़ 105 अंक सामान्य विकलांग की 19 अनुसूचित जनजाति की 44 एवं विकलांग अनुसूचित जाति की -21 कट ऑफ थी | तो यह सोचने वाली बात है की माइनस अंक लेन पर भी रिज़र्व केटेगरी के उम्मीदवार को एडमिशन मिल जाता है |
सोर्स “ 2015 कट ऑफ़ जे ई ई ऑफिसियल वेबसाइट ”
इसी आरक्षण का विरोध करने पर अनुसूचित जाति एवं जनजाति किसी भी दशा में नहीं चाहती है की आरक्षण ख़त्म हो , क्यूंकि संविधान की रचना के समय ड्राफ्टिंग कमेटी के चेयरमैन भीमराव अम्बेडकर जी ने इस बात का समर्थन किया था की आरक्षण मात्र 10 साल के लिए ही लागु किया जाना चाहिए एवं सामाजिक आरक्षण तभी तक किसी भी जाति को मिलना चाहिए जब तक की उनकी सामाजिक स्थिती अन्य जातियों के समकक्ष न हो जाये | लेकिन आरक्षण एक ऐसी मलाई बन चुकी है जिसे कोई भी वर्ग अब छोड़ना ही नहीं चाहता है,जबकि भीमराव अम्बेडकर यह चाहते थे की अनुसूचित जाति एवं जनजाति की सामाजिक और आर्थिक स्थिति सुधरने पर उन्हें यह आरक्षण त्याग देना चाहिए या आरक्षण पूर्ण रूप से ख़त्म कर देना चाहिए | परन्तु सामाजिक और आर्थिक स्थिति सुधरने पर भी अनुसूचित जाति एवं जनजाति वर्ग इसे छोड़ना नहीं चाह रहा है| क्यंकि सत्ता और राजनितिक पदों पर बैठे लोग इसे एक अहम् मुद्दा बनाये रखकर अपना वोट बैंक बचाकर रखना चाहते हैं , कई दलित नेता अरबो रूपये की संपत्ति बनाने के बाद भी आरक्षण का लाभ त्यागना नहीं चाहते हैं एवं दलित वर्ग का जो गरीब तबका है वे उनका खुद अप्रत्यक्ष रूप से शोषण कर रहे हैं एवं उन्हें आगे नहीं बढ़ने देना चाहते है| वे इस बात का तर्क देने से नहीं चुकते हैं की अगर आरक्षण से किसी की दिक्कत है तो 51.5 % आरक्षण अनुसूचित जाति एवं जनजाति को देकर सामान्य वर्ग उनके काम जैसे की लेट्रिन साफ़ करना आदि करने लगे , और सामान्य वर्ग के काम जैसे की देवालय चलाना वे करें | यह एक मात्र भ्रम है जो की धूर्त नेताओं के द्वारा फैलाया जा रहा है , वर्तमान में सभी कार्यालय में या अन्य स्थानों पे सभी जाति के लोग सभी तरह के कार्य करते पाए जाते हैं , किसी कार्यालय में भृत्य के पद के सामान्य वर्ग के लोग भी होते है , एवं कई मंदिरों में वहां की पूरी व्यवस्था तो दलित वर्ग पूर्ण ईमानदारी से निभा रहा है | ऐसे में इस तरह का तर्क देने वाले लोगो को तो निम्न पदों जैसे की स्वीपर या अन्य के लिए आवेदन देना ही नहीं चाहिए |
ऐसे में इस बात की आवश्यकता है की कोई भी व्यक्ति किसी भी वर्ग से हो अगर उसकी सामाजिक और आर्थिक स्थिति सुधर चुकी है तो उसे स्वयं आरक्षण का त्याग कर देना चाहिए | आरक्षण की असल में आवश्यकता उस गैरब तबके को है जिसके पर खाने तक के लिए दो वक़्त की रोटी तक नहीं , किसी नौकरी के फॉर्म को भरने तक के लिए पैसे नहीं, आरक्षण का आधार जातिगत न होकर आर्थिक होना ज्यादा आवश्यक है |
वैसे काफी हद तक अन्य पिछड़ा वर्ग आरक्षण छोड़ने को तैयार है क्यूंकि लगभग 57 पिछड़ा वर्ग को मात्र 27 प्रतिशत आरक्षण प्राप्त है यानि की सीधा 30 % का नुक्सान उन्हें प्रत्यक्ष रूप से हो रहा है आरक्षण समाप्त होने पर इसका सीधा लाभ पिछड़ा वर्ग को प्राप्त होगा| लेकिन इन सभी बातो के बावजूद हमें इस बात को नहीं भूलना चाहिए की हम सब भारतवर्ष में रहने वाले भारतीय नागरिक हैं सामान्य , पिछड़ा या अनुसूचित जाति , जनजाति या दलित वर्ग के नहीं | ताकि हमारी एकता को जाति के आधार पे बांटकर राजनितिक पार्टियाँ हमारा इस्तेमाल न कर पाए | अंत में लेख के शीर्षक के अनुसार आरक्षण की अब समीक्षा होना बहुत आवश्यक हो गया है |
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