*Banker Customer Relationship*
(बैंक एवं ग्राहक के बीच संबंध)
अलग अलग कार्यों के लिए बैंक एवं ग्राहक के संबंध भी अलग अलग होते हैं.
1. जब कोई व्यक्ति अपने खाते में (करेंट, सेविंग या किसी भी जमा योजना में) पैसा जमा करता है तो वह उस पैसे को बैंक से वापस लेने का अधिकार भी रखता है, ऐसे में
*बैंक-देनदार(Debtor) और ग्राहक-लेनदार(Creditor)* होता है,
2. जब कोई व्यक्ति बैंक से Loan, Overdraft,CC limit या किसी भी प्रकार का ऋण लेता है तो बैंक उसे वापस लेने का अधिकार रखता है, ऐसे में
*बैंक-लेनदार(Creditor) और ग्राहक-देनदार(Debtor)* होता है.
3.जब कोई कस्टमर बैंक में कोई Bond, Securities या कोई भी मूल्यवान वस्तु बैंक में रखता है *(जिसके बारे में बैंक को पता रहता है)* तब
*Customer- Bailor (बेलर)* और
*Bank- Bailee( बेली)* होते हैं.
Bailor याने अमानत या धरोहर रखने वाला
Bailee याने जमानत लेने वाला.
4. जब कोई कस्टमर बैंक से *लॉकर* लेता है *(जिसमें बैंक को यह पता नहीं रहता कि आपने क्या सामान रखा है और उसका मूल्य कितना है)* तब
*Customer- Lessee (लीजी)*
*Bank- Lessor (लेज़र)*
Lessee याने पट्टेदार (पट्टाधारक)
Lessor याने पट्टादाता
5. जब बैंक अपने कस्टमर के किसी आदेश के अनुसार कार्य करता है, जैसे चेक कलेक्शन या ड्राफ्ट बनाना आदि तब
*Bank-Agent*
और
*Customer-Principal* का संबंध बनता है.
6. जब कोई ट्रस्ट बनाया जाता है तब
*Bank- Trustee*
*Customer-Beneficiary*
का संबंध बनता है.
यहीं पर जब कोई कस्टमर बैंक में अपने खाते में जमा करने के लिए कोई चेक जमा करता है तो जब तक कस्टमर के खाते में उस चेक का पैसा जमा नहीं हो जाता तब तक *बैंक-ट्रस्टी एवं कस्टमर-बेनेफिशियरी(Beneficiary)* का संबंध रहता है.







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